बोन टीबी का सफल इलाज: जीवन में जब चारों तरफ अंधेरा छा जाए और विज्ञान भी हाथ खड़े कर दे, तब केवल उस पूर्ण परमात्मा की शरण ही एकमात्र सहारा बचती है। ऐसी ही एक अविश्वसनीय और हृदयस्पर्शी कहानी है बिहार के सुपौल जिले के एक छोटे से गांव कुपरिया के रहने वाले बच्चेलाल सरदार की।
भक्ति में डूबे थे, पर सुख से कोसों दूर थे
बच्चेलाल सरदार शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वे बजरंगबली, दुर्गा माता, श्री राम और श्री कृष्ण की अनन्य पूजा करते थे। इतना ही नहीं, वे एक कुशल गायक भी थे और भक्ति गीतों के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे। लेकिन विडंबना यह थी कि इतनी पूजा-पाठ के बाद भी उनके जीवन में न तो शारीरिक सुख था और न ही मानसिक शांति।
दिल्ली की गलियों से मिला ‘जीने की राह’ का संदेश
रोजी-रोटी की तलाश में बच्चेलाल सरदार दिल्ली चले गए और वहां रिक्शा चलाने लगे। दिल्ली में ही उनके कुछ साथियों के पास ‘जीने की राह‘ नामक पुस्तक थी। एक दिन उनकी निगाह उस पुस्तक पर पड़ी और उन्होंने उसे पढ़ना शुरू किया। पुस्तक में दिए गए आध्यात्मिक ज्ञान ने उनके सोचने का जरिया बदल दिया। इसके बाद उन्होंने टेलीविजन पर संत रामपाल जी महाराज के सत्संग देखने शुरू किए और अंततः 2017 में दिल्ली के नाम दान केंद्र से दीक्षा ली।
बेटी की ‘बोन टीबी’ और डॉक्टरों की चेतावनी
बच्चेलाल के जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा तब आई जब उनकी इकलौती बेटी गंभीर रूप से बीमार हो गई। सहरसा में जांच के बाद डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उसे बोन टीबी (Bone TB) है। डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कह दिया था कि यह बच्ची अब आजीवन अपंग रहेगी और कभी वजन नहीं उठा पाएगी। डॉक्टर के इन शब्दों ने एक पिता के पैरों तले जमीन खिसका दी थी।
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भक्ति से मिली नई जिंदगी: बोन टीबी का सफल इलाज
निराशा के उन क्षणों में बच्चेलाल ने अपने गुरु संत रामपाल जी महाराज से अरदास लगाई। उन्होंने परमात्मा से गुहार लगाई कि “हे बंदीछोड़, मेरी बेटी के बिना मेरा कोई सहारा नहीं है।” और फिर हुआ वो चमत्कार जिसकी कल्पना विज्ञान भी नहीं कर सकता।
बिना किसी भारी इलाज या दवा के, उनकी बेटी की बोन टीबी पूरी तरह ठीक हो गई। आज वह बच्ची न केवल स्वस्थ है, बल्कि घर के भारी काम भी कर लेती है और खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रही है।
आर्थिक और शारीरिक संकटों का हुआ अंत
संत रामपाल जी की शरण में आने के बाद केवल बेटी ही नहीं, बल्कि बच्चेलाल का अपना जीवन भी बदल गया:
- आर्थिक सुधार: बिहार लौटने पर उन्हें ‘मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना’ के तहत निशुल्क ऑटो रिक्शा मिला और साथ में 1 लाख रुपये का अनुदान भी प्राप्त हुआ।
- स्वास्थ्य लाभ: उनके सीने में लंबे समय से पिन जैसी चुभन होती थी, जो बढ़ती जा रही थी। भक्ति के नियमों का पालन करने और अरदास करने से वे बिना किसी डॉक्टर या दवा के पूरी तरह स्वस्थ हो गए।
बच्चेलाल सरदार आज गर्व से कहते हैं कि सच्चा गुरु ही जीवन की हर समस्या से छुटकारा दिला सकता है।
निष्कर्ष
बच्चेलाल सरदार का यह अनुभव हमें सिखाता है कि जब हम शास्त्र अनुकूल भक्ति और पूर्ण गुरु की शरण ग्रहण करते हैं, तो प्रारब्ध के कठिन से कठिन दुख भी कट जाते हैं। जिस बोन टीबी को डॉक्टरों ने लाइलाज और अपंगता का कारण बताया था, वह परमात्मा की दया से बिना किसी दवा के ठीक हो गई। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिक मार्ग केवल परलोक सुधारने के लिए नहीं, बल्कि इस लोक के दुखों को दूर करने के लिए भी अनिवार्य है।
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बच्चेलाल सरदार जी की तरह ही, हज़ारों लोगों ने संत रामपाल जी महाराज की सतभक्ति से अपने जीवन में अभूतपूर्व और चमत्कारी बदलाव महसूस किए हैं। उनकी बेटी का लाइलाज बीमारी से पूरी तरह स्वस्थ होना यह प्रमाणित करता है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति से हर असंभव कार्य संभव हो सकता है।
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FAQs
1. क्या संत रामपाल जी की भक्ति से बोन टीबी का इलाज संभव है?
हाँ, बच्चेलाल सरदार का अनुभव प्रमाणित करता है कि शास्त्र अनुकूल भक्ति और संत रामपाल जी की शरण से असाध्य बीमारियाँ भी ठीक हो सकती हैं।
2. बच्चेलाल सरदार को संत रामपाल जी के बारे में कैसे पता चला?
दिल्ली में रिक्शा चलाते समय उन्हें ‘जीने की राह’ पुस्तक मिली और टीवी पर सत्संग देखकर उन्होंने नाम दीक्षा लेने का निर्णय लिया।
3. संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा कैसे ले सकते हैं?
टीवी पर सत्संग के दौरान नीचे चल रही पीली पट्टी के नंबरों पर संपर्क करके या नजदीकी नाम दान केंद्र जाकर निशुल्क दीक्षा ली जा सकती है।
