वाराणसी (उत्तर प्रदेश): अध्यात्म की दुनिया में एक बहुत पुरानी धारणा चली आ रही है कि “गुरु बदलना पाप है।” लेकिन क्या यह सच है? क्या गुरु बदलना पाप है? अगर एक डॉक्टर से बीमारी ठीक न हो, तो क्या हम डॉक्टर नहीं बदलते? आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं वाराणसी के एक प्रतिष्ठित वकील, एडवोकेट अरुण कुमार दुबे जी से, जिन्होंने परम शांति और सत्य की खोज में एक-दो नहीं, बल्कि 20 गुरु बदले।
शांति की तलाश: 20 गुरु और अंतहीन भटकन
एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे अरुण कुमार दुबे जी बचपन से ही धार्मिक थे। उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और तमाम देवी-देवताओं की भक्ति की। वे बताते हैं कि उन्होंने देश के लगभग सभी बड़े संप्रदायों और आश्रमों से दीक्षा ली।
अरुण जी के अनुसार, “मैंने गायत्री परिवार, जय गुरुदेव, राधास्वामी, राम रहीम, आसाराम बापू और रजनीश (ओशो) जैसे लगभग 20 गुरुओं के पास जाकर नाम दान लिया। मैं जहाँ भी गया, मुझे यही कहा गया कि ‘ऐसे करो, वैसे करो’, लेकिन मुझे वह मानसिक शांति कभी नहीं मिली जिसे मैं खोज रहा था। मेरी साधना में कभी मन नहीं लगा और न ही मुझे कोई भौतिक या आध्यात्मिक लाभ हुआ।”
शराब का नशा और बीमारियों का जाल
20 गुरुओं से जुड़ने के बाद भी अरुण जी के जीवन में कोई सुधार नहीं आया। वे पिछले 20 वर्षों से शराब और मांस के शौकीन थे। कचहरी के माहौल में चेंबर के अंदर हुक्का पीना और बीयर बार जाना उनकी आदत बन चुकी थी। वे टीबी (TB) और हृदय रोग (Heart Pain) जैसी गंभीर बीमारियों से घिरे हुए थे। मुंबई के जे.जे. अस्पताल में इलाज कराने के बावजूद उन्हें कोई आराम नहीं मिल रहा था।
क्या गुरु बदलना पाप है? अरुण जी का तर्क
जब अरुण जी से पूछा गया कि क्या गुरु बदलना पाप है, तो उन्होंने एक वकील की तरह बहुत ही तार्किक (logical) जवाब दिया। उन्होंने कहा:
“समाज में यह गलत धारणा फैली है। यदि आप बीमार हैं और एक एम.डी. डॉक्टर के पास जाते हैं, लेकिन आपका मर्ज ठीक नहीं होता, तो क्या आप डॉक्टर नहीं बदलेंगे? निश्चित रूप से आप बेहतर डॉक्टर के पास जाएंगे। ठीक वैसे ही, यदि कोई गुरु आपको पूर्ण भक्ति और शांति नहीं दे पा रहा, तो वह गुरु कहलाने लायक ही नहीं है।”
उन्होंने संत रामपाल जी महाराज की पुस्तकों ‘जीने की राह’ और ‘गीता तेरा ज्ञान अमृत’ का हवाला देते हुए बताया कि शास्त्रों के अनुसार, यदि गुरु पूर्ण ज्ञानी (तत्त्वदर्शी) नहीं है, तो उसे त्याग कर पूर्ण गुरु की खोज करना कोई पाप नहीं, बल्कि अनिवार्य है।
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संत रामपाल जी महाराज की शरण और चमत्कारिक बदलाव
अरुण जी के चेंबर में एक दिन संत रामपाल जी महाराज की पुस्तक पहुँची। उसे पढ़ने के बाद वे अपनी पत्नी के साथ वाराणसी के नाम दान केंद्र पहुँचे और 19 नवंबर 2019 को दीक्षा प्राप्त की। इसके बाद उनके जीवन में जो हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं:
- नशा मुक्ति: 20 साल पुरानी शराब, मांस और सिगरेट की लत बिना किसी मेहनत के पूरी तरह छूट गई।
- असाध्य रोगों का अंत: भयंकर टीबी और हार्ट का दर्द, जिसके लिए वे पेन किलर खाते थे, वह पूरी तरह ठीक हो गया। आज वे पूर्ण स्वस्थ हैं।
- परिवार का उद्धार: उनका पोता जो मरने की कगार पर था, वह चंगा हो गया। उनका बड़ा बेटा जो कभी रेलवे ट्रैक पर पागलपन की स्थिति में मिला था, आज बैंक में Assistant Manager है। छोटा बेटा, जो गलत संगत में था, आज ‘काशी अखबार’ और प्रिंटिंग प्रेस का मालिक है।
- आर्थिक समृद्धि: पहले लाखों कमाने पर भी घर में पैसा नहीं बचता था, आज उनके पास 4 लग्जरी गाड़ियां हैं और वे अक्सर हवाई यात्राएं करते हैं।
निष्कर्ष
एडवोकेट अरुण कुमार दुबे जी की यह जीवन गाथा इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि जब इंसान हार मान लेता है, तब परमात्मा का ज्ञान उसे नई दिशा देता है। सालों पुरानी बीमारियों और शराब जैसे भयानक नशों से मुक्ति मिलना केवल संत रामपाल जी महाराज की सतभक्ति से ही संभव हो सका। आज अरुण जी न केवल स्वस्थ हैं, बल्कि एक मर्यादित और सुखी जीवन जी रहे हैं। यह साबित हो गया कि पूर्ण गुरु की खोज में आगे बढ़ना पाप नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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अरुण कुमार दुबे जी की तरह ही, हजारों लोगों ने संत रामपाल जी महाराज की शरण में आकर अपने जीवन के दुखों का अंत किया है। कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का ठीक होना और उजड़े हुए परिवारों का फिर से बसना यह साबित करता है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति में असीम शक्ति है।
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FAQS:
1. क्या शास्त्रों के अनुसार गुरु बदलना पाप है?
जी नहीं, शास्त्रों के अनुसार अधूरा गुरु त्यागना पाप नहीं है। जैसे बीमारी ठीक न होने पर हम डॉक्टर बदलते हैं, वैसे ही पूर्ण मोक्ष और सुख के लिए तत्वदर्शी संत की खोज करना अनिवार्य है।
2. संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा कैसे ले सकते हैं?
आप उनके सत्संग में दिए गए नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं या अपने नजदीकी नामदान केंद्र पर जा सकते हैं। नाम दीक्षा पूरी तरह निशुल्क है और मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य है।
3. क्या भक्ति से शराब और अन्य नशा छोड़ना संभव है?
हाँ, संत रामपाल जी महाराज की मर्यादा में रहकर की गई सतभक्ति से आत्मा को शक्ति मिलती है, जिससे एडवोकेट अरुण दुबे जैसे लाखों लोगों की बरसों पुरानी शराब और मांस की लत छूट गई।
